(त्वरित टिप्पणी) – श्री पशुपतिनाथ की शाही सवारी में जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी पर छिड़ी बहस, चुनावी सियासत तक पहुंचा मामला!, हिंदू नेता रविंद्र पांडे की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर समर्थक और विरोधी आमने-सामने
Madhya Pardesh / मंदसौर। भगवान अष्टमुखी श्री पशुपतिनाथ की शाही सवारी के दौरान जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी को लेकर हिंदू नेता रविंद्र पांडे द्वारा जताई गई नाराजगी के बाद मंदसौर में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। पांडे की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है।
रविंद्र पांडे ने मीडिया के समक्ष जनप्रतिनिधियों को नसीहत देते हुए कहा कि धर्म और हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने वाले जनप्रतिनिधियों को धार्मिक आयोजनों में भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। उनकी इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर सवाल-जवाब और तीखी प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हो गया।
पांडे की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए राजेश देवड़ा ने कहा कि यह एक धार्मिक कार्यक्रम है और इसमें श्रद्धालुओं को अपनी आस्था के अनुसार शामिल होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि धार्मिक आयोजन में राजनीतिक लोगों के आने का इंतजार क्यों किया जाए।
वहीं अंबालाल चौहान ने कहा कि भगवान पशुपतिनाथ की शाही सवारी पूरे दिन नगर भ्रमण करती है और इसमें लोग अपनी श्रद्धा एवं सुविधा के अनुसार शामिल होते हैं।
“सभी जनप्रतिनिधि मौजूद थे”
सोशल मीडिया पर रविंद्र पांडे की टिप्पणी के जवाब में एक अन्य प्रतिक्रिया में तीखा पलटवार किया गया। प्रतिक्रिया में कहा गया कि, “क्यों झूठ फैला रहे हो, व्यर्थ की बात करते हो। सभी जनप्रतिनिधि, जिलाध्यक्ष अपनी टीम सहित और नपा अध्यक्ष भी यहीं थे। आपको नहीं दिखे, वो बात अलग है।”
प्रतिक्रिया देने वाले ने आगे कहा कि, “आप गलत बात बोल रहे हो और कैमरे के सामने झूठी बात कर रहे हो। मैं पूरे समय वहीं था, सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक।” साथ ही भगवान का नाम लेते हुए पांडे को नसीहत दी गई और कहा गया कि, “फोटो देख लो, इसमें आप भी हो।”
इन प्रतिक्रियाओं के बाद सोशल मीडिया की बहस और तीखी हो गई। अब बहस का मुख्य केंद्र यह बन गया है कि आखिर शाही सवारी में कौन-कौन जनप्रतिनिधि मौजूद था और किस समय उनकी सहभागिता रही।
धार्मिक आयोजन को राजनीति से दूर रखने की मांग
इस बहस में सुजीत शर्मा पंडित ने भी धार्मिक आयोजनों को राजनीति से दूर रखने की बात कही। उनका कहना था कि जिस व्यक्ति के मन में सच्ची श्रद्धा होगी, वह स्वयं भगवान के कार्यक्रम में पहुंचेगा। उन्होंने गणेश उत्सव सहित अन्य धार्मिक आयोजनों में नेताओं को विशेष रूप से आरती के लिए बुलाने की परंपरा पर भी सवाल उठाए।
धीरज पाटीदार ने रविंद्र पांडे की टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पशुपतिनाथ की शाही सवारी सुबह से शाम तक नगर भ्रमण करती है और इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी एवं समाजसेवी अपनी-अपनी भूमिका में सहभागी रहते हैं। उनका कहना था कि धर्म और आस्था प्रदर्शन का विषय नहीं है तथा धार्मिक मामलों में इस प्रकार की बयानबाजी से बचना चाहिए।
वहीं पुष्कर कुमावत ने विधायक विपिन जैन के समर्थन में कहा कि विधायक धार्मिक कार्यों में पीछे नहीं रहते और विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों में उनकी सहभागिता रहती है।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका और सार्वजनिक दायित्व पर भी चर्चा
सोशल मीडिया पर पुष्पेंद्र भावसार सहित अन्य लोगों की प्रतिक्रियाओं में जनप्रतिनिधियों की संवैधानिक भूमिका का भी उल्लेख किया गया। उनका कहना था कि संवैधानिक पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों को संविधान की भावना के अनुरूप सभी धर्मों का सम्मान करना होता है।
कुछ प्रतिक्रियाओं में कहा गया कि कोई जनप्रतिनिधि किसी धार्मिक आयोजन में 15 मिनट देता है तो कोई दो घंटे, यह उनके सार्वजनिक दायित्वों और व्यस्तताओं के बीच निभाई जाने वाली भूमिका का हिस्सा हो सकता है। ऐसे में किसी धार्मिक कार्यक्रम में उपस्थिति के समय को राजनीतिक मुद्दा बनाना उचित नहीं माना जाना चाहिए।
बोहरा समाज का उदाहरण भी आया सामने
सोशल मीडिया की बहस में बोहरा समाज का उदाहरण देते हुए कहा गया कि देश में समाज के विभिन्न वर्ग अपने धार्मिक पर्व और परंपराएं अनुशासन एवं आस्था के साथ मनाते हैं। यदि किसी धार्मिक आयोजन में कोई जनप्रतिनिधि कुछ समय के लिए सहभागिता करता है तो इसे अलग दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
मनोज शर्मा जांगीड़ ने पूर्व मुख्यमंत्री के पशुपतिनाथ की शाही सवारी में शामिल होने का उदाहरण देते हुए वर्तमान जनप्रतिनिधियों की सक्रियता पर सवाल उठाए। वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने कहा कि धार्मिक आयोजनों का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए।
“दूसरे की ओर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकें”
शाही सवारी को लेकर चल रही बहस के बीच एक सोशल मीडिया यूजर ने रविंद्र पांडे की टिप्पणी पर तीखा पलटवार किया। प्रतिक्रिया में कहा गया कि “सबको अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए।”
टिप्पणी में यह भी कहा गया कि दूसरे पर आरोप लगाने से पहले व्यक्ति को अपने आचरण पर भी विचार करना चाहिए। प्रतिक्रिया देने वाले ने कहा कि “दूसरे की तरफ एक उंगली उठाओगे तो आपकी तरफ तीन उंगलियां उठेंगी।”
सोशल मीडिया प्रतिक्रिया में यह भी कहा गया कि भगवान की शरण में कौन आया और कौन नहीं आया, इससे शाही सवारी की भव्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यदि कोई जनप्रतिनिधि देर से पहुंचा तो इसका अर्थ यह नहीं कि सवारी प्रभावित हुई। भगवान पशुपतिनाथ की शाही सवारी निकली और श्रद्धा व उत्साह के साथ संपन्न हुई।
इस दौरान सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और कटाक्ष भी देखने को मिले। कुछ प्रतिक्रियाओं में रविंद्र पांडे की टिप्पणी और उनके उद्देश्य पर सवाल उठाए गए। हालांकि, ऐसे व्यक्तिगत आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
धर्म, राजनीति और चुनावी चर्चा का नया केंद्र
पशुपतिनाथ की शाही सवारी से शुरू हुई यह बहस अब सोशल मीडिया पर धर्म, राजनीति और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर व्यापक चर्चा का विषय बन गई है। एक पक्ष धार्मिक आयोजनों में जनप्रतिनिधियों की सक्रिय मौजूदगी को महत्वपूर्ण मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष धर्म और आस्था को राजनीति से अलग रखने की पैरवी कर रहा है।
मंदसौर की राजनीति में यह बहस आगामी चुनावी माहौल के संदर्भ में भी चर्चा का विषय बनती दिखाई दे रही है। समर्थक और विरोधी अपने-अपने तर्क, तस्वीरों और दावों के साथ सोशल मीडिया पर आमने-सामने हैं।
हालांकि, सोशल मीडिया पर सामने आए विभिन्न दावे, आरोप और प्रतिक्रियाएं संबंधित व्यक्तियों के निजी विचार हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर आवश्यक है। इस लेख में व्यक्त विचारों अथवा सोशल मीडिया टिप्पणियों से लेखक अथवा समाचार प्रतिनिधि का व्यक्तिगत समर्थन या हित अभिप्रेत नहीं है।
संकलनकर्ताः राधेश्याम मारू, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता