अफीम नीति किसानों के लिए ‘ऊंट के मुंह में जीराः तरुण बाहेती / 12 हजार मीट्रिक टन सीपीएस डोडा गोदामों में जमा, फिर नए सीपीएस पट्टे बढ़ाने की जरूरत क्या? कृ जिला कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार की अफीम नीति पर उठाए सवाल
नीमच। मध्यप्रदेश, नीमच, केंद्र सरकार की अफीम नीति 2026-27 को लेकर किसानों में नाराजगी के बीच जिला कांग्रेस अध्यक्ष तरुण बाहेती ने नीति को किसान विरोधी बताते हुए विरोध जताया है। उन्होंने कहा कि अफीम उत्पादक किसानों को इस बार नई नीति से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन नीति में किसानों को राहत देने के बजाय कई ऐसी शर्तें रखी गई हैं, जिनसे उनके सामने पट्टे खोने का संकट खड़ा हो गया है। नीति जारी होने में करीब सवा महीने की देरी, लूणी-चीरनी पद्धति के नए पट्टे जारी नहीं करने, मार्फिन के मानकों में बढ़ोतरी और अफीम के शासकीय भाव नहीं बढ़ाने जैसे मुद्दों पर उन्होंने केंद्र सरकार से पुनर्विचार की मांग की है।
बाहेती ने आरोप लगाया कि नीमच, मंदसौर सहित पूरे अफीम उत्पादक क्षेत्र के किसानों की समस्याओं को नीति में पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने क्षेत्रीय सांसद सुधीर गुप्ता पर भी किसानों के हितों की प्रभावी पैरवी नहीं करने का आरोप लगाया। उनके अनुसार, किसानों को आश्वासन दिए गए थे कि लूणी-चीरनी पद्धति के पट्टों में बढ़ोतरी होगी, लेकिन नई नीति से किसानों को निराशा हाथ लगी है।
12 हजार मीट्रिक टन सीपीएस डोडा जमा, फिर पट्टे बढ़ाने की जरूरत क्यों?
तरुण बाहेती ने कहा कि उनके अनुसार सरकार के गोदामों में करीब 12,000 मीट्रिक टन सीपीएस डोडा-चूरा पहले से जमा है। जब इसका निस्तारण और प्रसंस्करण ही चुनौती बना हुआ है, तो सीपीएस पद्धति के पट्टों को बढ़ाने की आवश्यकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि सरकार को सीपीएस पद्धति का विस्तार करने के बजाय पारंपरिक लूणी-चीरनी पद्धति के पट्टों में बढ़ोतरी पर ध्यान देना चाहिए था। इससे परंपरागत तरीके से अफीम की खेती करने वाले किसानों को राहत मिल सकती थी।
सीपीएस किसानों से किए वादे पूरे नहीं होने का आरोप
बाहेती ने कहा कि पिछले वर्ष सीपीएस पद्धति में अच्छा औसत देने वाले किसानों को आगामी वर्ष लूणी-चीरनी यानी चीरा पद्धति के पट्टे मिलने की उम्मीद थी। इसके बावजूद इस वर्ष एक भी नया लूणी-चीरनी पट्टा जारी नहीं किए जाने से किसानों में असंतोष है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले बेहतर उत्पादन देने वाले सीपीएस किसानों को पारंपरिक पद्धति में पात्रता मिलने की उम्मीद थी, लेकिन नई शर्तों के कारण उनके लिए रास्ता और कठिन हो गया है। उन्होंने सरकार से इन प्रावधानों की समीक्षा कर पात्र किसानों को प्राथमिकता देने की मांग की।
मार्फिन के मानक बढ़ने से किसानों की चिंता बढ़ी
मार्फिन के न्यूनतम मानकों में बढ़ोतरी को लेकर भी बाहेती ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले मार्फिन का मानक 4.2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था, जिसे वर्ष 2026-27 के लिए 4.4 किलोग्राम किया गया। वहीं, आगामी वर्ष 2027-28 की पात्रता के लिए इसे सीधे 5.9 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर किए जाने पर उन्होंने चिंता जताई।
बाहेती के अनुसार, मौसम में बदलाव, बेमौसम बारिश, फसल में बीमारी और सिंचाई संबंधी समस्याओं के बीच किसानों से अचानक अधिक उत्पादन की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने कहा कि मानकों में बढ़ोतरी से पहले किसानों को उन्नत तकनीक, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और पर्याप्त प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
10 हजार नए पट्टों के दावे पर भी उठाए सवाल
बाहेती ने कहा कि नए पट्टे देने की बात कही जा रही है, लेकिन 10 हजार पट्टों का आंकड़ा मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के लिए बताया जा रहा है। ऐसे में नीमच और मंदसौर के किसानों को वास्तविक रूप से कितना लाभ मिलेगा, यह स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने बढ़ती लागत के बावजूद अफीम के शासकीय भाव नहीं बढ़ाए जाने पर भी नाराजगी जताई। उनके अनुसार, किसानों को बीज, खाद, दवाइयों, सिंचाई और मजदूरी पर लगातार अधिक खर्च करना पड़ रहा है, लेकिन उन्हें उनकी मेहनत के अनुरूप आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा।
सीमित रकबा और पट्टे होल्ड होने से बढ़ी परेशानी
बाहेती ने सीमित रकबे में लाइसेंस देने और उत्पादन से जुड़े कड़े नियमों पर सवाल उठाते हुए कहा कि कम उत्पादन के आधार पर किसानों के पट्टे होल्ड किए जाने से उनके सामने भविष्य में खेती जारी रखने का संकट पैदा हो रहा है। उन्होंने 40 किलोग्राम प्रति 5 आरी से कम डोडा-चूरा उत्पादन के आधार पर पट्टे होल्ड किए जाने की व्यवस्था पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ओलावृष्टि, बेमौसम बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से फसल को होने वाले नुकसान को ध्यान में रखे बिना केवल उत्पादन के आंकड़ों के आधार पर किसानों की पात्रता तय करना उचित नहीं है। प्राकृतिक आपदा के कारण उत्पादन कम होने पर किसानों को राहत मिलनी चाहिए, न कि उनके पट्टे निरस्त या होल्ड किए जाने की स्थिति पैदा होनी चाहिए।
1997-98 से होल्ड पट्टों की समीक्षा की मांग
जिला कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि वर्ष 1997-98 में प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल खराब होने से जिन किसानों के पट्टे होल्ड किए गए थे, उनमें से कई किसान आज भी अपने अधिकार से वंचित हैं। उन्होंने सरकार से पुराने मामलों की निष्पक्ष समीक्षा कर पात्र किसानों के पट्टे बहाल करने की मांग की। बाहेती ने कहा कि वर्षों से लंबित मामलों का समाधान होना चाहिए, ताकि जिन किसानों की पात्रता बनती है, उन्हें फिर से अफीम की खेती करने का अवसर मिल सके।
सांसद पर किसानों की पैरवी नहीं करने का आरोप
बाहेती ने क्षेत्रीय सांसद सुधीर गुप्ता पर निशाना साधते हुए कहा कि अफीम उत्पादक किसानों की समस्याओं को केंद्र सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से उठाया जाना चाहिए था। उन्होंने सवाल किया कि जब नीति समय पर जारी नहीं हो सकी और किसानों की प्रमुख मांगों पर राहत नहीं मिली, तो क्षेत्र के किसानों को इसका लाभ कैसे मिलेगा। उन्होंने कहा कि चुनाव और बैठकों के दौरान किसानों को लूणी-चीरनी पट्टों में बढ़ोतरी सहित कई उम्मीदें दिलाई गई थीं, लेकिन नई नीति में इन अपेक्षाओं के अनुरूप राहत नहीं दिखाई दे रही है। संकट के इस दौर में जनप्रतिनिधियों को किसानों की समस्याओं पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
सरकार से नीति में सुधार और पारदर्शिता की मांग
तरुण बाहेती ने केंद्र सरकार से अफीम नीति की समीक्षा कर किसानों को राहत देने की मांग की। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसानों के पट्टे निरस्त या होल्ड नहीं किए जाने चाहिए। बेहतर उत्पादन देने वाले सीपीएस किसानों को प्राथमिकता के आधार पर लूणी-चीरनी पद्धति के पट्टे दिए जाएं तथा मार्फिन और उत्पादन संबंधी मानकों में व्यावहारिक राहत प्रदान की जाए। उन्होंने अफीम के शासकीय भाव बढ़ाने, अफीम की फसल को फसल बीमा और मुआवजा व्यवस्था में शामिल करने, किसानों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन उपलब्ध कराने तथा पट्टा आवंटन की सूची विभागीय वेबसाइट पर सार्वजनिक करने की भी मांग की। साथ ही, वर्ष 1997-98 से लंबित पट्टों की समीक्षा कर पात्र किसानों को राहत देने की बात कही।
बतादें, बाहेती ने कहा कि केंद्र सरकार को अफीम नीति में जल्द सुधार कर किसानों के हितों की रक्षा करनी चाहिए। किसानों की समस्याओं का समाधान केवल उत्पादन के आंकड़ों से नहीं, बल्कि मौसम की परिस्थितियों, खेती की लागत और उनकी वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।