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सेंगोल (Sengol) भारत की आज़ादी से जुड़ा है इतिहास

सेंगोल (Sengol) अब नए संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किया जाएगा।

नई दिल्ली। पंडित जवाहर लाल नेहरू (Pandit Jawaharlal Nehru) ने 14 अगस्त, 1947 की रात लगभग 10:45 बजे तमिलनाडु के अधिनाम के माध्यम से सेंगोल को स्वीकार किया। सेंगोल अंग्रेजों से सत्ता का हस्तांतरण हमारे देशवासियों को करने का संकेत माना गया। सेंगोल का आज़ादी का एक अहम ऐतिहासिक प्रतीक माना जाता है क्योंकि सेंगोल अंग्रेजो से भारतीयों को सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक है। इसलिए इसे काफी खास माना जाता है।
सेंगोल का जुड़ाव चोल वंश से भी है। चोल वंश में जब सत्ता का हस्तांतरण होता था, तब गद्दी पर विराजमान राजा नए बनने वाले राजा को सेंगोल सौंपकर सत्ता का हस्तांतरण दर्शाता था। सेंगोल को हिंदी में राजदंड कहते हैं और चोल वंश में इसका इस्तेमाल महत्वपूर्ण माना जाता था। चोल वंश में जब कोई राजा अपना उत्तराधिकारी घोषित करता था, तब अपने उत्तराधिकारी को भी सेंगोल सौंपता था। सेंगोल सौंपना चोल वंश में एक अहम परंपरा मानी जाती थी।
चोल वंश में सेंगोल का इस्तेमाल सत्ता के हस्तांतरण के लिए किया जाता था। फिर अंग्रेजो से भारतीयों को सत्ता के हस्तांतरण के बाद सेंगोल देश में सत्ता का प्रतीक बन गया।
सेंगोल संस्कृत शब्द “संकु” से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है “शंख”। हिंदू धर्म में शंख को काफी पवित्र माना जाता है। यह चोल साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। पुरातन काल में सेंगोल को सम्राटों की शक्ति और अधिकार का प्रतीक माना जाता था। इसे राजदंड भी कहा जाता था। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो इस सेंगोल को अंग्रेजों से सत्ता मिलने का प्रतीक माना गया। अब नए संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किया जाएगा। शाह ने बताया है कि अभी तक इस सेंगोल को इलाहाबाद के संग्रहालय में रखा गया था।

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