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बच्चों की सुरक्षा और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को लेकर जारी बहस के बीच केंद्र सरकार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया, सरकार इस मुद्दे पर एक नया कानून लाने की तैयारी में है, जिसे संसद के आगामी मानसून सत्र में पेश किया जा सकता

नई दिल्ली। डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को लेकर जारी बहस के बीच केंद्र सरकार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। शीर्ष सरकारी सूत्रों के अनुसार, सरकार बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है। इसके बजाय, 18 वर्ष से कम उम्र के किशोरों के लिए एक बारीक और श्रेणीबद्ध (नुआंस्ड और ग्रेडेड) दृष्टिकोण अपनाने पर विचार किया जा रहा है, जिसमें उम्र के हिसाब से अलग-अलग पाबंदियां और सुरक्षा मानक तय किए जाएंगे। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक, सरकार इस मुद्दे पर एक नया कानून लाने की तैयारी में है, जिसे संसद के आगामी मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है। प्रस्तावित रूपरेखा के तहत बच्चों को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी 8 से 12 वर्ष के बच्चों की होगी, जिनके लिए सबसे अधिक प्रतिबंधात्मक नियम होंगे। दूसरी श्रेणी 12 से 16 वर्ष के किशोरों की होगी, जहां मध्यम स्तर की निगरानी रखी जाएगी। वहीं, 16 से 18 वर्ष की आयु वर्ग के लिए अधिक स्वतंत्रता होगी, लेकिन वे कड़े सुरक्षा मानकों के दायरे में रहेंगे। सरकार का मानना है कि आज की पीढ़ी अधिक जागरूक है, इसलिए पूर्ण प्रतिबंध के बजाय नियमों को तर्कसंगत बनाना बेहतर विकल्प है। आईटी मंत्रालय के भीतर चल रही चर्चाओं में टाइम-बेस्ड लिमिट यानी समय सीमा का विकल्प सबसे प्रमुख है। इसके तहत प्रावधान किया जा सकता है कि बच्चों को शाम या रात के समय सोशल मीडिया लॉग-इन करने की अनुमति न हो और दिन भर के उपयोग के लिए भी एक निश्चित समय, जैसे एक घंटा, निर्धारित किया जाए। साथ ही, किसी भी प्लेटफॉर्म तक पहुंच के लिए माता-पिता की अनिवार्य तकनीकी सहमति को लिंक करने पर भी विचार हो रहा है। यह मॉडल काफी हद तक चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के हालिया कदमों से प्रेरित नजर आता है। वर्तमान में आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों ने अलग-अलग उम्र सीमा के साथ प्रतिबंध के प्रस्ताव रखे हैं, जिससे तकनीकी कंपनियों में असमंजस की स्थिति है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग नियमों को लागू करना जटिल होगा। इसी को देखते हुए केंद्र सरकार एक समान केंद्रीय कानून की दिशा में बढ़ रही है ताकि पूरे देश में मानक एक जैसे हों। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी डिजिटल लत और मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं के कारण उम्र-आधारित सीमाएं तय करने और लक्षित विज्ञापनों को रोकने की सिफारिश की गई थी। हालांकि, नागरिक अधिकार समूहों ने चेतावनी दी है कि ऐसे प्रतिबंधों का सावधानी से मूल्यांकन जरूरी है, ताकि यह डिजिटल जेंडर गैप को न बढ़ाए और बच्चों की सूचना तक पहुंच को पूरी तरह बाधित न करे। NEWS@ EMS INDIA

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